संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि कोरोना महामारी के कारण स्कूलों के बंद होने से पूरी दुनिया में करीब 46.3 करोड़ बच्चे ऑनलाइन क्‍लासेज का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।
ऑनलाइन क्‍लासेज से दूर हैं दुनिया के 46 करोड़ से अधिक बच्‍चे

-- धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी

 

संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि कोरोना महामारी के कारण स्कूलों के बंद होने से पूरी दुनिया में करीब 46.3 करोड़ बच्चे ऑनलाइन क्‍लासेज का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि इस महामारी की वजह से लगे लॉकडाउन के बाद पूरी दुनिया में करीब डेढ़ अरब बच्चे प्रभावित हुए हैं।

 

संयुक्‍त राष्‍ट्र की संस्‍था यूनिसेफ के इस अध्ययन में सामने आया है कि पूरी दुनिया में करीब 46.3 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जिनके पास दूरस्‍थ शिक्षा ग्रहण करने के लिए कोई साधन नहीं हैं। यूनिसेफ की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑनलाइन शिक्षा तक पहुंच पाने में भौगोलिक अंतर भी देखने को मिला है। उदाहरण के लिए, अफ्रीका या एशिया के कुछ हिस्सों के मुकाबले यूरोप में काफी कम बच्चे इससे प्रभावित हुए हैं। इस रिपोर्ट में लगभग 100 देशों से डाटा एकत्र किया गया है, जिसमें इंटरनेट, टीवी और रेडियो तक लोगों की पहुंच का आकलन किया गया था।

 

रिपोर्ट के मुताबिक, जो बच्चे ऑनलाइन शिक्षा नहीं ग्रहण पा रहे हैं, उनमें 6.7 करोड़ पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में हैं, 5.4 करोड़ पश्चिमी और मध्य अफ्रीका में, आठ करोड़ प्रशांत और पूर्वी एशिया में, 3.7 करोड़ मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में, 14.7 करोड़ दक्षिण एशिया में, 1.3 करोड़ लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि संभव है कि ऐसे बच्चे, जिनके पास ऑनलाइन पढ़ाई के लिए साधन हैं, वे भी दूसरी अड़चनों की वजह से पढ़ाई नहीं कर पा रहे होंगे। जैसे घर पर पढ़ने के लिए अच्छी जगह का अभाव, परिवार के लिए दूसरे काम करने का दबाव, कंप्यूटर या मोबाइल में तकनीकी खराबी अथवा इंटरनेट कनेक्टिविटी ठीक न होना इत्‍यादि।

भारत में भी कोरोना महामारी की वजह से मार्च महीने से ही सभी स्कूल बंद हैं और अभी इनके जल्दी खुलने की भी कोई उम्मीद नहीं है, इसलिए ज्यादातर स्कूलों में ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है। सभी राज्य ई-शिक्षा के माध्यम से बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा के प्रति अत्यंत गंभीर हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्‍या देश के सभी हिस्‍सों में छात्र आसानी से ऑनलाइन शिक्षा हासिल कर पा रहे हैं?

 

एनसीईआरटी के एक ताजा सर्वेक्षण में सामने आया है कि भारत के 27 प्रतिशत छात्रों के पास स्मार्टफोन और लैपटॉप नहीं है। 28 प्रतिशत छात्र बार-बार बिजली जाने की वजह से ठीक से पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। वहीं 33 प्रतिशत छात्रों ने माना कि ऑनलाइन क्लासेज के दौरान वे पढ़ाई पर ठीक से ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं। यह सर्वेक्षण केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय और सीबीएसई से जुड़े स्कूलों में पढ़ने वाले 34 हजार छात्रों, पैरेंट्स और टीचर्स से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है।

उधर, नेशनल सैम्‍पल सर्वे ऑफिस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 90 लाख छात्रों के पास ऑनलाइन शिक्षा की कोई सुविधा नहीं है। भारत में 24 प्रतिशत घर सिर्फ स्मार्टफोन के जरिए इंटरनेट से जुड़े हुए हैं और सिर्फ 11 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं जिनमें इंटरनेट कनेक्शन वाला एक कंप्यूटर है। ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति तो और भी ज्यादा खराब है। यहां बार-बार बिजली जाना और इंटरनेट कनेक्टिविटी बड़ी समस्‍या है।

 

इनके अतिरिक्त ऑनलाइन शिक्षा में एक और बड़ी बाधा है कि तकनीकी साक्षरता में हम काफी पिछड़े हैं। अगर तकनीकी शिक्षा से जुड़े अध्यापकों और विद्यार्थियों को छोड़ दें तो बाकी लगभग सभी विषयों से जुड़े शिक्षकों और शिक्षार्थिंयों को तकनीकी समस्या का सामना करना पड़ता है। प्रारंभिक शिक्षा के  स्तर पर यह बहुत बड़ी समस्या है।

अब ऐसे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि देश में ऑनलाइन शिक्षा का भविष्य क्या होगा। उपरोक्‍त आंकड़ों के आधार पर स्‍पष्‍ट है कि अब भी देश के आधे से ज्यादा छात्र ठीक तरह से ऑनलाइन शिक्षा हासिल नहीं कर पा रहे हैं। अत: अगर देश के कर्णधारों का भविष्‍य अंधकारमय होने से बचाना है तो सरकार को आगे आकर तत्‍काल इन समस्‍याओं का समाधान निकालना होगा। यूनिसेफ ने भी दुनियाभर की सरकारों से कहा है कि वे लॉकडाउन के प्रतिबंधों में ढील देते समय स्कूलों को सुरक्षित रूप से फिर से खोलने को प्राथमिकता दें। जहां भी स्कूलों को फिर से खोलना संभव न हो, वहां सरकारें ‘खोए समय की भरपाई के लिए अतिरिक्त शिक्षा’ का इंतजाम करें।

 

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