भाजपा सरकार की भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति राजधानी में ही फेल नजर आ रही है। दरअसल, मलिहाबाद तहसील में पूर्व में तैनात रहे अधिकारियों के भ्रष्टाचार पर पहले तो पर्दा डालने का काम किया जाता है।
सीएम की नाक के नीचे मलिहाबाद तहसील के भ्रष्टाचारियों पर नहीं हो रही कार्रवाई

Lucknow. भाजपा सरकार की भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति राजधानी में ही फेल नजर आ रही है। दरअसल, मलिहाबाद तहसील में पूर्व में तैनात रहे अधिकारियों के भ्रष्टाचार पर पहले तो पर्दा डालने का काम किया जाता है। उसके बाद यदि खुलासा हो जाए ​तो भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए अधिकारी और कर्मचारी ही उनके साथ खड़े नजर आ रहे हैं। 

करीब दो साल पहले कसमंडी कला स्थित तालाब की जमीन का रकबा कम करके दो व्यक्तियों के नाम करने के मामले का खुलासा हुआ था। इसके तीन दशक पहले के इस मामले में कई लोगों के खिलाफ मलिहाबाद कोतवाली में धोखाधड़ी करने और अभिलेख गायब करने का मुकदमा रजिस्टार कानूनगो की ओर से दर्ज कराया गया था। इस मुकदमे में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं की गई है और न ही आरोप पत्र दाखिल किया गया है। इस हल्के में तैनात रहे दारोगा सर्वेश शुक्ला यह कहकर मामले को टालते रहे कि तहसील के अधिकारी सहयोग नहीं कर रहे हैं। उन्होंने आज तक किसी की गिरफ्तारी भी नहीं की है। अब इस हल्के में दूसरे दारोगा आ गए हैं, उनका कहना है कि उन्हें अभी यह मुकदमा आवंटित हुआ है, लेकिन उन्होंने अभी उसको देखा नहीं है। 

बता दें कि कसमंडी कला में रोड के किनारे तालाब है, जिस पर तहसील में तैनात रहे दो कर्मचारियों की नीयत खराब हो गई। इसी क्षेत्र के होने के कारण लेखपाल और कानूनगो की पोस्ट पर तैनाती के दौरान तालाब के 5 गाटे, जिनका रकबा डेढ़ बीघे है दो व्यक्तियों के नाम कर दिया। यह कारनामा करने के बाद तहसील से अभिलेख भी गायब कर दिए गए। इन लोगों ने सेवानिवृ​त्त होने के बाद हेराफेरी कर सरकारी जमीन दिलाने के बदले अपने परिवारीजनों के नाम उसमें से कुछ जमीन बैनामा करा ली। 

इस मामले का खुलासा होने के बाद तहसील के अधिकारियों ने आनन-फानन में एक ही दिन में तत्कालीन एसडीएम ने उक्त जमीन को पुन: तालाब में दर्ज कर दिया और स्थानीय थाने में एफआईआर भी दर्ज करा दी। इसके अलावा आरोपियों और उससे जुड़े लोगों को बचाने के उद्देश्य से जमीन से कब्जा हटाने के बजाय उस पर 115 डी के तहत तहसीलदार न्यायिक मलिहाबाद की अदालत में मुकदमा करके अपना पल्ला झाड़ लिया। इसी का फायदा उठाकर आज तक आरोपी खुलेआम बाहर खूम रहे हैं। वहीं, तहसीलदार ने न मुकदमा समाप्त किया और न ही तहसील वालों ने कब्जा हटवाया।

इसी तरह के दूसरा मामला मवई खुर्द का है, जिसमें पैसे का खेल होने की आशंका व्यक्त की जा रही है, क्योंकि तहसील वालों की लापरवाही की वजह से अब गरीबों के पेट पर लात मारने का काम किया जा रहा है। इस मामले में एक माह बाद भी अभी तक कोई ठोस कार्रवाई प्रशासनिक स्तर पर नहीं की गयी है, जिससे दलित पट्टेदारों को भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया गया है। अब वे दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

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