अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ‘एमनेस्टी’ ने कहा है कि इस साल फरवरी में दिल्ली में हुए दंगों में पुलिसकर्मी भी हिंसा में सक्रिय रूप से भागीदार थे
एमनेस्‍टी की रिपोर्ट : पुलिस भी ‘भागीदार’ थी दिल्‍ली दंगों में

--धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी

 

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ‘एमनेस्टी’ ने कहा है कि इस साल फरवरी में दिल्ली में हुए दंगों में पुलिसकर्मी भी हिंसा में सक्रिय रूप से भागीदार थे, लेकिन उनके द्वारा किए गए मानवाधिकारों के उल्लंघन के संबंध में अभी तक एक भी जांच नहीं बिठाई गई है।

 

एमनेस्‍टी की इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में हुए दंगों में पुलिस की भूमिका एक बार फिर सवालों के घेरे में है। एमनेस्टी ने यह रिपोर्ट तैयार करने के लिए दंगाग्रस्त इलाकों की पड़ताल की थी और करीब 50 लोगों से बातचीत की। इनमें दंगों में अपनी जान बचाने वाले, चश्मदीद गवाह, कई वकील, डॉक्टर, मानवाधिकार कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त पुलिस अफसर शामिल थे। संस्था ने कई वीडियो की समीक्षा भी की।

एमनेस्टी ने दिल्‍ली दंगों पर अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि दंगे 23 से 29 फरवरी तक चले थे और इनमें कम से कम 50 लोगों की मौत हुई थी। इन दंगों में हजारों लोग बेघर भी हो गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने कई जगहों पर अपने सामने हो रही हिंसा को रोकने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की। उल्‍टे पुलिस ने नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले लोगों पर हमला किया और उन्हें गिरफ्तार किया। कई मामलों में तो पुलिस ने पीड़ितों की शिकायतें दर्ज करने से भी इनकार कर दिया। रिपोर्ट में पुलिस द्वारा दंगों में बच जाने वालों और हिरासत में लिये जाने वालों को यातनाएं देने की भी बात कही गई है।  

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस ने वकीलों और पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार किया और कई जगह उनके ऊपर हमले भी किए गए। साथ ही रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि दंगों में अपनी जान बचा लेने वालों में से कइयों को पुलिस ने डराया, उन्‍हें गैरकानूनी ढंग से हिरासत में रखा और सादे कागजों पर उनसे जबरन दस्‍तखत भी कराए। इनमें से कई लोगों के वकीलों ने एमनेस्टी को बताया कि पुलिस ने कई गिरफ्तारियां बिना वारंट के कीं और लोगों को कानूनी मदद लेने से जबरन दूर रखा गया।

 

अपनी रिपोर्ट के मद्देनजर एमनेस्टी का कहना है कि पुलिस के खिलाफ इन आरोपों की तुरंत, विस्तृत, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। संस्था ने यह भी मांग की है कि पीड़ितों द्वारा पहचाने गए पुलिसकर्मियों को जांच के नतीजे आने तक निलंबित कर देना चाहिए और भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए पुलिसकर्मियों को पुलिस की भूमिका के बारे में प्रशिक्षण देना चाहिए। संस्था ने इसके अलावा कई और मांगें भी उठाई हैं। उदाहरण के लिए, केंद्र सरकार यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन टॉर्चर को तुरंत मंजूर करे, संसद पुलिस को जांच करने, हिरासत में लेने और गिरफ्तार करने की शक्तियां देने वाले सभी कानूनों को और सख्त करे और राज्यों और शहरों के पुलिस मुख्यालयों में मानवाधिकार सेल स्थापित करने की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सिफारिश को लागू किया जाए।

 

हालांकि दिल्ली पुलिस ने अभी तक एमनेस्टी की इस रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों पर कोई टिप्पणी नहीं की है। इससे पहले भी दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की एक जांच रिपोर्ट में दिल्‍ली पुलिस पर इसी तरह के आरोप लगाए गए थे। तब दिल्ली पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी अनिल मित्तल ने मीडिया को दिए एक बयान में कहा था कि दिल्ली दंगों के सभी मामलों की जांच न्यायपूर्वक और पेशेवर ढंग से हुई है।

 

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