लखनऊ के अलीगंज स्थित केंद्रीय विद्यालय के विज्ञान शिक्षक सुशील द्विवेदी ने गौरैया के घर को बनाने के शौक को पूरा करते हुए जूतों के अनुपयोगी डिब्बों से सैकड़ों घोंसले बना डाले।
जूतों के अनुपयोगी डिब्बों से बना डाले सैकड़ों घोंसले

 लखनऊ के अलीगंज स्थित केंद्रीय विद्यालय के विज्ञान शिक्षक सुशील द्विवेदी ने गौरैया के घर को बनाने के शौक को पूरा करते हुए जूतों के अनुपयोगी डिब्बों से सैकड़ों घोंसले बना डाले। उनके शौक को देखकर हजारों लोग भी इससे प्रभावित हुए और आज सुशील द्विवेदी अपने घर के आसपास के 15 हजार से ज्यादा बच्चों को भी यह हुनर सिखा चुके हैं। 

पेशे से शिक्षक सुशील द्विवेदी की पहचान एक पर्यावरणविद् के रुप में भी है। विश्व गौरेया दिवस पर उन्होंने बातचीत में कहा कि गौरैया बेहद घरेलू, शर्मीला और मनमोहक पक्षी है। हमसे रूठी हुई गौरैया पुनः हमारे घरों मैं टंगे घोंसले में लौट आती है तो इससे अच्छी बात क्या होगी। इसके लिए कुछ कार्य करने की जरुरत है, सर्वप्रथम अगर गौरैया आपके घर में घोसला बनाए तो उसे बनाने दें उसे हटाए नही। रोजाना अपने आंगन, खिड़की, बाहरी दीवारों पर उनके लिए दाना-पानी रखें।

उन्होंने कहा कि अपने वाहनों की उचित समय पर सर्विसिंग कराएं, जिससे वायु प्रदूषण कम हो और गौरैया को स्वच्छ हवा मिले। गर्मी के दिनों में अपने घर की छत पर एक बर्तन में पानी भरकर रखें। जूते के खाली डिब्बों, प्लास्टिक की बड़ी बोतलों और मटकियों में छेद करके इनका घर बना कर उन्हें उचित स्थानों पर लगाए। हरियाली बढ़ाएं, छतों पर घोंसला बनाने के लिए कुछ जगह छोड़ें और उनके घोंसलों को नष्ट न करें। प्रजनन के समय उनके अंडों की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। कीटनाशक का प्रयोग कम करें। 

अपने शौक के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें घोंसले बनाने का शौक बचपन से है। जब वे अपने जीवन में शिक्षक बन गये और एक पिता बनकर अपने बच्चों को घोंसले बनाना सिखाने लगे तो यह शौक फिर से जागा। उन्होंने अपने बच्चों के साथ में आसपास रहने वाले और स्कूली बच्चों को  विभिन्न कार्यशालाओं के माध्यम से खेल खेल में  जीरो लागत वाले घोंसले बनाना सिखाया है। उनके घर के आस पास के घरों के बच्चों ने घोंसले बनाकर अपने घरों में टांगें हैं। 

सुशील द्विवेदी के अनुसार हमारी आधुनिक जीवन शैली गौरैया को सामान्य रूप से रहने के लिए बाधा बन गई। पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई, खेतों में कृषि रसायनों का अधिकाधिक प्रयोग, यूकेलिप्टिस के पेड़ों का सामाजिक वानिकी के रूप में लगना , टेलीफोन टावरों से निकलने वाली तरंगें, घरों में सीसे की खिड़कियाँ इनके जीवन के लिए प्रतिकूल हैं। साथ ही साथ, जहां कंक्रीट की संरचनाओं के बने घरों की दीवारें घोंसले को बनाने में बाधक हैं वहीं घर, गाँव की गलियों का पक्का होना भी इनके जीवन के लिए घातक है, क्योंकि ये स्वस्थ रहने के लिए धूल स्नान करना पसंद करती हैं जो नहीं मिल पा रहा है। ध्वनि प्रदूषण भी गौरैया की घटती आबादी का एक प्रमुख कारण है।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण  गौरैया हमसे दूर होती जा रही है गौरैया के गायब होने का मतलब है सीधे सीधे किसानों की पैदावार घटना  सिर्फ सरकार के भरोसे हम इंसानी दोस्त गौरैया को नहीं बचा सकते हैं। इसके लिए हमें आने वाली पीढ़ी  विशेषकर बच्चों को हमें बताना होगा की गौरैया अथवा दूसरे विलुप्त होते पक्षियों का महत्व हमारे मनवीय जीवन और पर्यावरण के लिए क्या खास अहमियत रखता है। प्रकृति प्रेमियों को अभियान चलाकर लोगों को मानव जीवन में पशु-पक्षियों के योगदान की जानकारी देनी होगी।इसके अलावा स्कूली पाठ्यक्रमों में हमें गौरैया और दूसरे पक्षियों को शामिल करना होगा। वरना वरना वह दिन दूर नहीं जब गौरैया हमारे आस पास से पूरी तरह गायब हो जायेगी व हम उसे  गूगल पर या किताबों मैं देख पाएंगे।

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