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जयपुर शहर को नाट्य उत्सवों की आदत लग चुकी है


ANAMIKA PANDEY 09/12/2016 17:20

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जयपुर: "आप लोगों में से जिनके पास नाटक देखने से भी अधिक ज़रूरी काम हो, और वे बस इसलिए आए हैं कि 10 या पांच मिनट में निकल जाएंगे, उनसे अनुरोध है, वे अभी निकल जाएं..." कहां तो रंगमंच दर्शकों के लिए तरसता रहता है, और कहां यह निकल जाने की सलाह... उद्घोषक आशय स्पष्ट करता है कि दर्शकों का मूवमेंट नाटक की जीवंतता को भंग कर सकता है और नाटक वह है, जो फिल्म या तमाशे की तरह नहीं देखा जा सकता, इसलिए नाटक के दर्शक को भी प्रशिक्षित करना पड़ता है, क्योंकि कुछ लोग प्रेक्षागृह से बीच में निकल जाते हैं.
सुबह के 11 बजे हैं, प्रेक्षागृह के पास पहुंचता हूं तो लोग पहले से लाइन में लगे हैं, नाटक शुरू होने का वक्त हो चुका है, प्रेक्षागृह लगभग भर चुका है.  दर्शक अंदर व्यवस्थित हो रहे हैं. सुबह के 11 बजे और नाम से एक्स्पेरिमेंटल लगने वाला नाटक, शनिवार का दिन और नाटक देखने के लिए इतनी भीड़. यह शहर जयपुर है, जगह जवाहर कला केंद्र हैं और आयोजन 'जयरंगम' है, जो हिन्दीभाषी प्रदेश में बिना सरकारी पहल के आयोजित होने वाला सबसे बड़ा रंगोत्सव है, और यह इसका पांचवां संस्करण है.
अधिकांश नाटकों के दो शो रखे गए हैं. कारण बताते हैं आयोजक दीपक गेरा, "पिछले साल मकरंद देशपांडे के शो में जितने लोग नाटक देख रहे थे, उतने लोग बाहर थे और वे नाटक समाप्त होने के बाद भी इंतज़ार में डटे हुए थे कि नाटक देख लेंगे. मकरंद ने उन्हें फोन किया कि नाटक का दूसरा शो कर लूं. मैंने कहा, कर लीजिए. उन्होंने उसी समय दूसरा शो किया, इसलिए हमने इस बार लगभग सभी नाटकों का दूसरा शो रखा है..." मैं नाटक से निकलकर रंग संवाद में पहुंचता हूं. वहां भी पंडाल लगभग भरा हुआ है. अधिकांश रंगकर्मी हैं और फोटोग्राफर बहुत नज़र आ रहे हैं. मकरंद देशपांडे, संजना कपूर और दीपक गेरा की बातचीत बिलकुल अनौपचारिक तरीके से हो रही है, लेकिन इसमें ज्यादा मजा आ रहा है. दिल्ली की व्यवस्थित और पेशेवर बातचीत से कहीं अधिक, क्योंकि इसमें कच्चेपन की ईमानदारी है, और यही आजकल दुर्लभ है.



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